समदर्शी

शब्द मेरे साथी हैं, खामोशी मेरे गुरु

रामधारी सिंह दिनकर का चित्र

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

हिंदी साहित्य में जब भी ओज, शौर्य और राष्ट्रीय चेतना की चर्चा होती है, तो सबसे पहले जिस नाम की स्मृति कौंधती है, वह है रामधारी सिंह ‘दिनकर’। वे ऐसे कवि थे जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की चेतना से जोड़ा। उनकी कविताओं में संघर्ष…

Read More
हिन्दी दिवस

हिंदी दिवस : राष्ट्र के आत्मा का स्वर

भारत की धड़कन उसकी भाषाओं में बसती है, और उनमें भी हिंदी वह धारा है जो उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक भारत को एक सूत्र में बाँधती है। यह भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीय चेतना की जीवनरेखा है। संस्कृत की पवित्र धारा से बहती हुई हिंदी…

Read More
इंतिहान लिख दूँ

जिंदगी के इम्तिहान

एक सुनहरी सुबह की कोई शाम लिख दूँ,ठोकर खाकर जो गिरा, वो अंजाम लिख दूँ।जज़्बातों के भँवर में ऐसे उलझा हूँ, यारो,चलो ज़िंदगी के सारे इम्तिहान लिख दूँ। जो सीखा है हमने अपनी तन्हाइयों में,उस हर सफ़े पर अपना पैग़ाम लिख दूँ।कभी सन्नाटों ने दिया हौसला मुझको,कभी आंधियों में खुद ही सँभाला खुद को। अब…

Read More

📝 सेवक – एक लोकतांत्रिक मिथक

✍️ कुन्दन समदर्शी जब कोई नेता मंच से गरजकर कहता है – “मैं जनता का सेवक हूँ!”,तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सिकंदर खुद कह रहा हो – “मैं जूते सिलने आया हूँ!”यह कथन जितना आदर्शवादी और मधुर सुनाई देता है,व्यवहार में उतना ही विरोधाभासी और विडंबनापूर्ण मालूम होता है। आज के नेताओं की ज़ुबान…

Read More
जिंदगी का संघर्ष

ज़िंदगी की सलवटें

✍️-कुन्दन समदर्शीसमकुन्दन समदर्शीदर्शीन् समदर्शी संघर्षों की धूप देखी है,ऐ ज़िंदगी…कितने ज़ख़्मों के निशां अब भी हैं उर-अंतर में। ये ज़ख़्म…जो अबचीखते नहीं,बस चुपचापसीने की तहों मेंकुछ गहरी सलवटों-से पड़े हैं,जिन्हें समय की उँगलियों नेसिर्फ़ स्पर्श किया—कोई गाँठ न खुली। माथे की लकीरेंअब इबारत नहीं रचतीं,वे अबअनकहे स्वप्नों के अस्फुट मानचित्र हैं—जिन्हें वक़्त ने देखा भी,पर…

Read More
रामचन्द्र शुक्ल का चित्र

कविता क्या है?

✍️ लेखक — आचार्य रामचंद्र शुक्ल मनुष्य अपने भावों, विचारों और व्यापारों के लिए दिए दूसरों के भावों, विचारों और व्यापारों के साथ कहीं मिलता और कहीं लड़ाता हुआ अंत तक चला चलता है और इसी को जीना कहता है। जिस अनंत-रूपात्मक क्षेत्र में यह व्यवसाय चलता रहता है उसका नाम है जगत्। जब तक…

Read More
gupt ji image

नर हो, न निराश करो मन को

✍️ मैथिलीशरण गुप्त नर हो, न निराश करो मन कोकुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करोयह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न होकुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन कोसँभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भलासमझो…

Read More
Maun samvedana image

🕯️ संवेदना का मौन

✍️ कुन्दन समदर्शी कुचल दिए कुछ प्रश्न थे,जो चीखते थे मौन में।कुछ उत्तर थे भीड़ के,जो दब गए समय के शोर में। वेदना लिपटी है मुस्कानों में,जैसे राख में बुझी चिंगारी।कोई देखे तो कह दे — अभिनय है,कोई सुने तो कहे — लाचारी। संवेदना का बाज़ार है,दया यहाँ दामों में बिकती है,आँसू भी अब डिब्बों…

Read More
Premchand image

पूस की रात

प्रेमचंद हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है, लाओ, जो रुपए रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे। मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली—तीन ही तो रुपए हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी? उससे कह दो, फसल पर दे देंगे।…

Read More
sipahi ka chitra

उसने कहा था

✍️ रचना: चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ (एक)बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की ज़बान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है, और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए, इक्के वाले…

Read More