सवाल दो जून के रोटी की

दो जून की रोटी का संघर्ष का चित्र

समय बदल गया, सरकारें बदल गईं, तकनीक बदल गई, जीवन की रफ्तार बदल गई। बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन तक और चिट्ठियों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का सफर तय हो गया। लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में एक सवाल ऐसा है जो आज भी अपनी जगह से नहीं हिला—दो जून की रोटी का सवाल।
आजकल सोशल मीडिया पर किसी की आर्थिक परेशानी का मज़ाक उड़ाना हो तो लोग हँसते हुए लिख देते हैं—’भाई, बस दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाए।’ मीम्स बनते हैं, चुटकुले वायरल होते हैं और कुछ ही सेकंड में लाखों लोग उस पर हँसकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि यह चार शब्द भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति में इतने गहरे क्यों धँसे हुए हैं?
अगर किसी समाज में भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकता एक मुहावरा बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि इतिहास ने उस समाज को बहुत गहरे घाव दिए हैं।
“दो जून की रोटी” किसी कवि की कल्पना नहीं है। यह भारत की उस सामूहिक पीड़ा का दस्तावेज़ है जो सदियों तक खेतों, खलिहानों, कारखानों और मजदूर बस्तियों में पसीने के साथ बहती रही। उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र की बोलियों में “जून” का अर्थ समय या वक्त होता है। सुबह और शाम—यानी दिन के दो समय का भोजन। लेकिन धीरे-धीरे यह शब्द मात्र भोजन का संकेत नहीं रहा, बल्कि सम्मानजनक जीवन की न्यूनतम आकांक्षा का प्रतीक बन गया।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के आरंभिक भारत को देखिए। एक तरफ जमींदारी शोषण, दूसरी तरफ अकाल, ऊपर से औपनिवेशिक आर्थिक नीतियाँ। किसान अन्न पैदा करता था, लेकिन पेट भर नहीं खा पाता था। मजदूर दिनभर श्रम करता था, लेकिन भूख उससे तेज दौड़ती थी। ऐसे समय में साहित्यकारों ने समाज को पढ़ा और पाया कि करोड़ों लोगों का पूरा जीवन केवल दो वक्त के भोजन की व्यवस्था में ही समाप्त हो जाता है।
मुंशी प्रेमचंद ने इस पीड़ा को केवल देखा नहीं, जिया भी था। आर्थिक अभाव उनके जीवन का स्थायी साथी रहा। शायद इसी कारण उनके पात्र काल्पनिक नहीं लगते, वे आज भी हमारे आसपास दिखाई देते हैं। “गोदान” का होरी अमीर बनने का सपना नहीं देखता। उसकी सबसे बड़ी इच्छा है कि परिवार भूखा न सोए। “कफ़न” के घीसू और माधव की त्रासदी केवल गरीबी नहीं है; वह भूख है जिसने संवेदनाओं तक को निगल लिया है। जब मनुष्य भूख से हार जाता है, तब नैतिकता भी उसके सामने छोटी पड़ जाती है।
प्रेमचंद और उनके समकालीन साहित्यकारों ने भूख को इसलिए लिखा क्योंकि भूख उनके समय का सबसे बड़ा यथार्थ थी।
लेकिन दुखद बात यह है कि वह यथार्थ आज भी पूरी तरह इतिहास नहीं बन पाया है।
हाँ, अब हमारे पास 5G इंटरनेट है। मेट्रो ट्रेनें हैं। डिजिटल इंडिया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। दुनिया हमें उभरती हुई आर्थिक शक्ति कहती है। हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुँच चुके हैं और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का सपना देख रहे हैं। लेकिन यदि विकास का वास्तविक पैमाना मनुष्य का जीवन है, तो प्रश्न उठता है कि क्या “दो जून की रोटी” का संघर्ष समाप्त हो गया?
सुबह शहर की सड़क पर निकलिए। एक डिलीवरी बॉय आपके ऑर्डर लिए भाग रहा होगा। एक कैब ड्राइवर बारह घंटे की ड्यूटी के बाद भी अगली सवारी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कोई निर्माण मजदूर धूप में ईंट ढो रहा होगा। तकनीक बदल गई, साधन बदल गए, वर्दियाँ बदल गईं, लेकिन श्रम का उद्देश्य वही है—घर लौटते समय इतना पैसा बच जाए कि चूल्हा जल सके।
प्रेमचंद के होरी के हाथ में हल था, आज के युवक के हाथ में स्मार्टफोन है; पर दोनों की चिंता का केंद्र एक ही है—परिवार का पेट।
विडम्बना यह है कि आज शिक्षा का विस्तार हुआ है, विश्वविद्यालय बढ़े हैं, डिग्रियाँ बढ़ी हैं, लेकिन रोजगार की चिंता भी उसी अनुपात में बढ़ी है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। भर्ती परीक्षाएँ होती हैं, रद्द होती हैं, फिर होती हैं, फिर अदालतों में पहुँच जाती हैं। डिग्री हाथ में होती है, सपने आँखों में होते हैं, लेकिन अंततः चिंता वहीं जाकर टिकती है—क्या नौकरी मिलेगी? क्या घर चल पाएगा? क्या दो जून की रोटी की व्यवस्था हो पाएगी?
कभी-कभी लगता है कि हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि हम युवाओं को विश्वगुरु बनने का सपना दिखाते हैं, लेकिन उनमें से करोड़ों आज भी एक स्थायी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं।
लोकतंत्र की विडम्बना भी कम दिलचस्प नहीं है। चुनावी मंचों पर राष्ट्रवाद, धर्म, जाति, विदेश नीति, सुरक्षा और वैश्विक नेतृत्व पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं। लेकिन जिस नागरिक के नाम पर यह पूरा लोकतंत्र खड़ा है, उसकी सबसे बड़ी चिंता आज भी रसोई में रखे खाली डिब्बे हैं। सत्ता बदलती है, नारे बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, घोषणाएँ बदलती हैं, लेकिन गरीब की थाली में रोटी की संख्या अक्सर वही रहती है।
हर चुनाव में गरीबी हटाने का वादा किया जाता है। पिछले कई दशकों से यह वादा लगातार दोहराया जा रहा है। आश्चर्य यह है कि सरकारें बदलती रहीं, योजनाएँ बदलती रहीं, नारे बदलते रहे, लेकिन गरीबी इतनी अनुभवी निकली कि हर राजनीतिक प्रयोग के बाद भी जीवित बची रही। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में कुछ चीजें अमर हैं—लोकतंत्र, चुनावी वादे और गरीब की “दो जून की रोटी” की चिंता। गरीबी हटाने की घोषणाएँ अक्सर गरीबी हटाने से अधिक सफल सिद्ध हुई हैं।
निश्चित रूप से कल्याणकारी योजनाएँ आवश्यक हैं। मुफ्त राशन, स्वास्थ्य सहायता, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएँ कमजोर वर्गों के लिए जीवनरेखा हैं। लेकिन प्रश्न यह भी है कि किसी राष्ट्र की अंतिम सफलता क्या अपने नागरिकों को स्थायी सहायता पर निर्भर रखना है या उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन स्वयं चला सकें? यदि दशकों बाद भी करोड़ों लोगों के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकारी राशन तक सीमित हो जाए, तो यह केवल गरीबी का नहीं, विकास मॉडल का भी प्रश्न है।
विडम्बना का एक और चेहरा सोशल मीडिया पर दिखाई देता है। डिजिटल दुनिया में हर दूसरा व्यक्ति विदेशी यात्राओं, लग्जरी कारों, महंगे रेस्तराँ और आलीशान जीवनशैली का प्रदर्शन कर रहा है। तस्वीरों और वीडियो के बीच ऐसा लगता है मानो पूरा देश सम्पन्नता के उत्सव में डूबा हुआ हो। लेकिन इस चमकदार स्क्रीन के पीछे एक दूसरा भारत भी है, जो राशन कार्ड, दिहाड़ी मजदूरी, उधार और किस्तों के सहारे जीवन काट रहा है। एक भारत इंस्टाग्राम की चमक में दिखाई देता है, दूसरा भारत सरकारी आँकड़ों, राशन कार्डों और मजदूरी की पर्चियों में दर्ज रहता है।
और इसी बीच एक और भयावह विरोधाभास जन्म लेता है।
एक तरफ शादी समारोहों, होटलों और पार्टियों में टनों भोजन रोज़ कूड़ेदान में चला जाता है। दूसरी तरफ उसी आयोजन स्थल के बाहर कोई बच्चा बची हुई प्लेटों की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा होता है। एक तरफ लोग वजन कम करने के लिए महंगे डाइट प्लान खरीदते हैं, दूसरी तरफ कोई परिवार कैलोरी नहीं, रोटियाँ गिनकर खाता है।
यह केवल आर्थिक असमानता नहीं है; यह संवेदनाओं की असमानता भी है।
आज “दो जून की रोटी” का मुहावरा गरीबी से अधिक हमारी सामाजिक चेतना का आईना बन गया है। यह हमें याद दिलाता है कि विकास केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों, तेज इंटरनेट और बढ़ते शेयर बाजार से नहीं मापा जा सकता। विकास तब होगा जब किसी बच्चे की भूख किसी रिपोर्ट का आँकड़ा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चिंता बनेगी।
सोशल मीडिया के दौर में यह मुहावरा मज़ाक का विषय बन सकता है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए यह आज भी जीवन का सबसे गंभीर प्रश्न है। शायद यही कारण है कि प्रेमचंद के पात्र पुराने नहीं पड़ते। वे हर युग में नए चेहरे पहनकर हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। कभी होरी किसान बनकर, कभी दिहाड़ी मजदूर बनकर, कभी डिलीवरी बॉय बनकर, तो कभी बेरोजगार डिग्रीधारी युवक बनकर।
और इसलिए, जब अगली बार कोई हँसते हुए कहे कि “बस दो जून की रोटी मिल जाए”, तब याद रखिए कि यह केवल एक मुहावरा नहीं है। यह उन करोड़ों अनसुनी कहानियों की आवाज़ है जिनके सपने महलों से शुरू नहीं होते, बल्कि रसोई के चूल्हे से शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाते हैं।
आज प्रश्न यह नहीं है कि देश कितना विकसित हुआ है। प्रश्न यह है कि विकास की चमक में क्या हम उस व्यक्ति को देख पा रहे हैं जिसकी पूरी महत्वाकांक्षा अब भी शाम को घर लौटकर अपने बच्चों को भरपेट खाना खिलाने भर की है?
यदि किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि चंद्रमा तक पहुँचना है, तो उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि पृथ्वी पर कोई भूखा न सोए।
इसलिए “दो जून की रोटी” केवल एक मुहावरा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संवेदना की सबसे कठिन परीक्षा है।
जब तक किसी बच्चे की भूख किसी रिपोर्ट का आँकड़ा और किसी नेता के भाषण का विषय बनी रहेगी, जब तक विकास के दावों और भूख की वास्तविकताओं के बीच यह दूरी बनी रहेगी, तब तक यह मुहावरा जीवित रहेगा।
और जब तक यह मुहावरा जीवित है, तब तक यह सवाल भी जीवित रहेगा—
क्या हमने गरीबी मिटाई है, या केवल उसके साथ जीने की कला विकसित कर ली है?

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