kabir ka chitra

कबीर : एक समग्र मूल्यांकन

भारतीय साहित्य के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हैं जो किसी एक युग, सम्प्रदाय या विचारधारा की सीमाओं में नहीं बँधते। वे समय की धारा को पार कर प्रत्येक पीढ़ी से संवाद करते हैं और हर नए युग में नए अर्थों के साथ हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कबीर ऐसे ही कालजयी कवि हैं। वे…

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दो जून की रोटी का संघर्ष का चित्र

सवाल दो जून के रोटी की

समय बदल गया, सरकारें बदल गईं, तकनीक बदल गई, जीवन की रफ्तार बदल गई। बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन तक और चिट्ठियों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का सफर तय हो गया। लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन में एक सवाल ऐसा है जो आज भी अपनी जगह से नहीं हिला—दो जून की रोटी का सवाल।आजकल सोशल मीडिया…

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सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का स्केच चित्र – छायावाद के महाप्राण कवि

निराला का काव्य और कथा साहित्य: एक समग्र अध्ययन

हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद का युग स्वर्णिम अध्याय के रूप में प्रतिष्ठित है और उसके चार प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल महाप्राण कवि ही नहीं, बल्कि समर्थ कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार भी थे। हिंदी कविता को परंपरागत बंधनों से मुक्त कर मुक्तछंद को…

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एक सहयात्री

“कई वर्ष बीत जाते हैं, पर कुछ यात्राएँ समय की धूल में नहीं दबतीं। वे स्मृति के किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहती हैं और जीवन के किसी अनपेक्षित क्षण में अचानक सामने आ खड़ी होती हैं। आज ऐसा ही एक क्षण आया—और उसके साथ लौट आई पटना से कटिहार तक की वह रेलयात्रा, जिसमें…

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साँझ के समय शहर की सड़क पर परछाइयों के बीच बहती ज़िन्दगी का दृश्य

परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी

✒️ कुन्दन समदर्शी परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,साँझ की उन -पगडंडियों सीजहाँ धूप थककर पेड़ों के तलेचुपचाप बैठ जाती है। हर कदम पर स्मृतियों कीकोमल पत्तियाँ चटकती हैं—कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,जैसे समय ने उन्हेंपूरा विदा करना भूल गया हो। हम तेज़ चले,कि कहीं यह न दिखेकि भीतर एक नन्हा-सा मनअब भी किसी पुराने…

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जीवन की अनवरत यात्रा का प्रतीक – शहर के रास्ते पर चलता एक यात्री

जीवन : एक अनवरत यात्रा

जीवन किसी स्थिर चित्र या जड़ संरचना का नाम नहीं है। वह तो एक निरंतर बहती हुई धारा है—जिसमें ठहराव नहीं, केवल प्रवाह है। इस प्रवाह में कभी संघर्षों की तीखी धूप हमें झुलसाती है, तो कभी सुकून की शीतल छाँव हमारी थकान को सहला जाती है। हर अनुभव, हर पड़ाव, हर ठोकर और हर…

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छायावाद के स्तंभ जयशंकर प्रसाद का चित्र

जयशंकर प्रसाद : छायावाद का विराट स्तम्भ

हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व केवल रचनाकार नहीं होते, वे युग-चेतना के निर्माता होते हैं। छायावादी युग में यदि किसी एक साहित्यकार ने कविता, नाटक और कथा—तीनों विधाओं में समान रूप से गहन, स्थायी और निर्णायक छाप छोड़ी है, तो वह हैं जयशंकर प्रसाद। उनका साहित्य किसी एक भाव, किसी एक प्रवृत्ति या…

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हंसों के साथ उड़ता कछुआ।

कछुआ और हंस

(नीति-कथा : वाणी पर संयम) एक तालाब में एक कछुआ रहता था। उसी तालाब में दो हंस प्रायः तैरने आया करते थे। हंस अत्यंत हंसमुख, मिलनसार और ज्ञानी थे। दूर-दूर तक घूमने के कारण वे अनेक स्थानों की अद्भुत बातें जानते थे। कछुए और हंसों की मित्रता शीघ्र ही गहरी हो गई। कछुए को हंसों…

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नव वर्ष और बसंत की आहट का प्रतीकात्मक चित्र

नव वर्ष : बसंत की आहट

आओ,नए वर्ष कोहथेली पर रखी धूप की तरहसहेज लें—जिसमें बीते कल की ठंडक भी होऔर आने वाले स्वप्नों की ऊष्मा भी।कुछ पत्तेझरे हैं स्मृतियों के;कुछ शाखाएँ अभी भीप्रतीक्षा में काँप रही हैं।पर देखो—कहीं भीतरकिसी कोपल नेफिर से हिम्मत की हैजन्म लेने की।नव वर्षकोई तिथि नहीं;यह तोजीवन की देह मेंफिर सेविश्वास कारक्त-संचार है।हवा मेंबसंत की पहली…

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मैथिलीशरण गुप्त का चित्र – हिंदी साहित्य के राष्ट्रकवि

मैथिलीशरण गुप्त : शब्दों में बसती सभ्यता

यदि किसी कवि को पढ़ते हुए ऐसी अनुभूति हो कि आप केवल शब्द नहीं पढ़ रहे, बल्कि शब्दों में निहित भावों के माध्यम से पूरी सभ्यता आपसे संवाद कर रही है — तो समझिए आप मैथिलीशरण गुप्त के संसार में प्रवेश कर चुके हैं।उनके यहाँ कविता भाषा नहीं रह जाती, संस्कार बन जाती है; पंक्तियाँ…

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