समदर्शी

शब्द मेरे साथी हैं, खामोशी मेरे गुरु

garibi ka chitra

कफ़न

प्रेमचंद एक झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी,…

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daroga ka chitra

नमक का दारोग़ा

प्रेमचंद जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर-प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड़-छोड़कर लोग इस विभाग की बर्क़-अंदाज़ी करते…

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panch ka chitra

पंच परमेश्वर 

प्रेमचंद  जुम्मन शेख़ और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते…

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Baba nagarjun image

✍️ बाबा नागार्जुन : जनकवि की कलम, जो व्यंग्य भी थी और वेदना भी

(जन्म विशेषांक – 30 जून 1911)लेखक – कुन्दन समदर्शी हर काल में कुछ कवि केवल शब्दों के साधक नहीं होते — वे समय के साहसी साक्षी होते हैं।बाबा नागार्जुन ऐसे ही जनकवि थे, जिनकी कविता ने साहित्य को सजाने के बजाय समाज को झकझोरने का कार्य किया।उनकी कविता में भूख की हूक है, क्रांति की…

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Aachar Sanhita kartoon image

“आचार संहिता लागू है – कृपया विकाश न करें “

हर देश में पर्व मनाए जाते हैं —कहीं दिवाली की दीयों से उजाला होता है, कहीं ईद की सेवइयाँ मिठास घोलती हैं,कहीं क्रिसमस के पेड़ सजते हैं, तो कहीं होली के रंग उड़ते हैं। हर राष्ट्र अपने-अपने त्योहारों में मग्न होता है —कभी धर्म के नाम पर, कभी परंपरा के, और कभी छुट्टी के बहाने।…

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मौन की मशाल का चित्रा

✨ मौन की मशाल

भूमिका:हर युग की क्रांति में शोर नहीं होता — कभी एक मौन ही होता है जो समय को जगा देता है। यह कविता उन खामोश आंदोलनों, लेखनी की ताकत, और आंतरिक ज्वालाओं को समर्पित है, जो बिना नारे, बिना बगावत के प्रतीक बन जाती हैं। हर काम शोर मचाकर नहीं होता,कुछ काम ख़ामोशी कर जाती…

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