नमक का दारोग़ा
प्रेमचंद जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर-प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करने लगे। अनेक प्रकार के छल-प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से। अधिकारियों के पौ-बारह थे। पटवारीगिरी का सर्वसम्मानित पद छोड़-छोड़कर लोग इस विभाग की बर्क़-अंदाज़ी करते…
पंच परमेश्वर
प्रेमचंद जुम्मन शेख़ और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते…
✍️ बाबा नागार्जुन : जनकवि की कलम, जो व्यंग्य भी थी और वेदना भी
(जन्म विशेषांक – 30 जून 1911)लेखक – कुन्दन समदर्शी हर काल में कुछ कवि केवल शब्दों के साधक नहीं होते — वे समय के साहसी साक्षी होते हैं।बाबा नागार्जुन ऐसे ही जनकवि थे, जिनकी कविता ने साहित्य को सजाने के बजाय समाज को झकझोरने का कार्य किया।उनकी कविता में भूख की हूक है, क्रांति की…
“आचार संहिता लागू है – कृपया विकाश न करें “
हर देश में पर्व मनाए जाते हैं —कहीं दिवाली की दीयों से उजाला होता है, कहीं ईद की सेवइयाँ मिठास घोलती हैं,कहीं क्रिसमस के पेड़ सजते हैं, तो कहीं होली के रंग उड़ते हैं। हर राष्ट्र अपने-अपने त्योहारों में मग्न होता है —कभी धर्म के नाम पर, कभी परंपरा के, और कभी छुट्टी के बहाने।…
✨ मौन की मशाल
भूमिका:हर युग की क्रांति में शोर नहीं होता — कभी एक मौन ही होता है जो समय को जगा देता है। यह कविता उन खामोश आंदोलनों, लेखनी की ताकत, और आंतरिक ज्वालाओं को समर्पित है, जो बिना नारे, बिना बगावत के प्रतीक बन जाती हैं। हर काम शोर मचाकर नहीं होता,कुछ काम ख़ामोशी कर जाती…