🕯️ संवेदना का मौन
✍️ कुन्दन समदर्शी कुचल दिए कुछ प्रश्न थे,जो चीखते थे मौन में।कुछ उत्तर थे भीड़ के,जो दब गए समय के शोर में। वेदना लिपटी है मुस्कानों में,जैसे राख में बुझी चिंगारी।कोई देखे तो कह दे — अभिनय है,कोई सुने तो कहे — लाचारी। संवेदना का बाज़ार है,दया यहाँ दामों में बिकती है,आँसू भी अब डिब्बों…