✒️ कुन्दन समदर्शी
परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,
साँझ की उन -पगडंडियों सी
जहाँ धूप थककर पेड़ों के तले
चुपचाप बैठ जाती है।
हर कदम पर स्मृतियों की
कोमल पत्तियाँ चटकती हैं—
कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,
जैसे समय ने उन्हें
पूरा विदा करना भूल गया हो।
हम तेज़ चले,
कि कहीं यह न दिखे
कि भीतर एक नन्हा-सा मन
अब भी किसी पुराने गीत को
धीमे-धीमे दोहरा रहा है।
रातें भारी हैं—
मधुर पीड़ा से भरी हुई,
जैसे किसी अधखिले फूल ने
खुद को ओस के हवाले कर दिया हो
बिना यह पूछे
कि सुबह उसे याद रखेगी भी या नहीं।
फिर भी—
इस नश्वर दौड़ में
सौंदर्य कहीं मरता नहीं,
वह तो थकान की पलकों पर
स्वप्न बनकर उतर आता है।
और ज़िन्दगी,
परछाइयों के बीच भागती हुई भी,
एक क्षण को ठहरकर
आकाश की ओर देखती है—
मानो जानती हो
कि क्षणभंगुर होना ही
उसकी सबसे सुंदर सच्चाई है।