आओ,
नए वर्ष को
हथेली पर रखी धूप की तरह
सहेज लें—
जिसमें बीते कल की ठंडक भी हो
और आने वाले स्वप्नों की ऊष्मा भी।
कुछ पत्ते
झरे हैं स्मृतियों के;
कुछ शाखाएँ अभी भी
प्रतीक्षा में काँप रही हैं।
पर देखो—
कहीं भीतर
किसी कोपल ने
फिर से हिम्मत की है
जन्म लेने की।
नव वर्ष
कोई तिथि नहीं;
यह तो
जीवन की देह में
फिर से
विश्वास का
रक्त-संचार है।
हवा में
बसंत की पहली साँस है—
जिसमें
फगुआ की हल्की नमी घुली है,
जो तन को
अनायास छू जाती है;
मन को
धीरे-धीरे बहकाती है,
और आत्मा को
लाज की तरह
गुनगुनाने पर
विवश करती है।
आज
शब्द भी
शृंगार करने निकले हैं।
वे केवल कह नहीं रहे—
वे
आँखों में
हल्का-सा काजल बनकर,
होंठों पर
मुस्कान की गर्माहट बनकर,
और हृदय में
अपनेपन की
मृदु मिठास
घोल रहे हैं।
चलो,
इस नव वर्ष
कुछ वादे नहीं—
कुछ रिश्ते नए करें;
जिनमें
औपचारिकता नहीं,
बस
थोड़ा-सा स्पर्श,
थोड़ा-सा भरोसा,
और बहुत-सा अपनापन हो।
यदि जीवन
फिर चुनौती दे,
तो हम
रोमांच की स्याही में
अपने सपनों के
नए अध्याय लिखेंगे—
डर को विराम नहीं,
अनुभव की
सीढ़ी बनाएँगे।
नव वर्ष,
तुम्हारा स्वागत है—
इस आशा के साथ
कि
हर सुबह
बसंत की ओर बढ़े,
हर शाम
मौन में भी
फाल्गुनी-सा
कोई राग छोड़ जाए,
और जीवन
एक बार फिर
धीरे-धीरे
सुंदर लगने लगे।
क्योंकि—
सुंदरता
पूर्णता की नहीं,
आगे बढ़ते रहने की
सबसे मानवीय
भाषा है।
✍️ कुन्दन समदर्शी