परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी
✒️ कुन्दन समदर्शी परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,साँझ की उन -पगडंडियों सीजहाँ धूप थककर पेड़ों के तलेचुपचाप बैठ जाती है। हर कदम पर स्मृतियों कीकोमल पत्तियाँ चटकती हैं—कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,जैसे समय ने उन्हेंपूरा विदा करना भूल गया हो। हम तेज़ चले,कि कहीं यह न दिखेकि भीतर एक नन्हा-सा मनअब भी किसी पुराने…