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“प्रेमचंद: हिंदी कथा-साहित्य के युगपुरुष”

जब-जब हिंदी साहित्य की चर्चा होती है, तब-तब प्रेमचंद का नाम श्रद्धा, सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है।उनका काल हिंदी कथा-साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है।वे केवल एक कथाकार या उपन्यासकार ही नहीं, बल्कि यथार्थ के महामार्ग पर चलने वाले एक महामानव थे, जिन्होंने समाज में व्याप्त दुःख, अन्याय और विषमता को शब्दों…

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“दशहरा और गांधी जयंती: सत्य की दो दिशाएँ”

दशहरा — वह विजय पर्व,जो हमें याद दिलाता है कि कभी एक युग में सत्य ने असत्य पर विजय पाई थी,धर्म ने अधर्म को परास्त किया था,और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरणों से रामराज्य की स्थापना हुई थी।जब श्रीराम ने रावण का वध किया,तो केवल एक राक्षस नहीं,बल्कि अहंकार, द्वेष, नफरत और छल का साम्राज्य…

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जीवन में दृष्टिकोण का महत्व

कहते हैं, चश्मे का रंग तय करता है कि दुनिया कैसी दिखेगी। वही आँखें, वही दृश्य, वही परिस्थितियाँ — पर दृष्टि का रंग बदलते ही संसार का अर्थ बदल जाता है। यही जीवन का रहस्य है — हम जिस दृष्टिकोण से संसार को देखते हैं, वही दृष्टिकोण हमारे सुख-दुःख, सुंदरता-कुरूपता और आशा-निराशा का निर्धारण करता…

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रामधारी सिंह दिनकर का चित्र

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

हिंदी साहित्य में जब भी ओज, शौर्य और राष्ट्रीय चेतना की चर्चा होती है, तो सबसे पहले जिस नाम की स्मृति कौंधती है, वह है रामधारी सिंह ‘दिनकर’। वे ऐसे कवि थे जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की चेतना से जोड़ा। उनकी कविताओं में संघर्ष…

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हिन्दी दिवस

हिंदी दिवस : राष्ट्र के आत्मा का स्वर

भारत की धड़कन उसकी भाषाओं में बसती है, और उनमें भी हिंदी वह धारा है जो उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक भारत को एक सूत्र में बाँधती है। यह भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीय चेतना की जीवनरेखा है। संस्कृत की पवित्र धारा से बहती हुई हिंदी…

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इंतिहान लिख दूँ

जिंदगी के इम्तिहान

एक सुनहरी सुबह की कोई शाम लिख दूँ,ठोकर खाकर जो गिरा, वो अंजाम लिख दूँ।जज़्बातों के भँवर में ऐसे उलझा हूँ, यारो,चलो ज़िंदगी के सारे इम्तिहान लिख दूँ। जो सीखा है हमने अपनी तन्हाइयों में,उस हर सफ़े पर अपना पैग़ाम लिख दूँ।कभी सन्नाटों ने दिया हौसला मुझको,कभी आंधियों में खुद ही सँभाला खुद को। अब…

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📝 सेवक – एक लोकतांत्रिक मिथक

✍️ कुन्दन समदर्शी जब कोई नेता मंच से गरजकर कहता है – “मैं जनता का सेवक हूँ!”,तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सिकंदर खुद कह रहा हो – “मैं जूते सिलने आया हूँ!”यह कथन जितना आदर्शवादी और मधुर सुनाई देता है,व्यवहार में उतना ही विरोधाभासी और विडंबनापूर्ण मालूम होता है। आज के नेताओं की ज़ुबान…

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जिंदगी का संघर्ष

ज़िंदगी की सलवटें

✍️-कुन्दन समदर्शीसमकुन्दन समदर्शीदर्शीन् समदर्शी संघर्षों की धूप देखी है,ऐ ज़िंदगी…कितने ज़ख़्मों के निशां अब भी हैं उर-अंतर में। ये ज़ख़्म…जो अबचीखते नहीं,बस चुपचापसीने की तहों मेंकुछ गहरी सलवटों-से पड़े हैं,जिन्हें समय की उँगलियों नेसिर्फ़ स्पर्श किया—कोई गाँठ न खुली। माथे की लकीरेंअब इबारत नहीं रचतीं,वे अबअनकहे स्वप्नों के अस्फुट मानचित्र हैं—जिन्हें वक़्त ने देखा भी,पर…

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रामचन्द्र शुक्ल का चित्र

कविता क्या है?

✍️ लेखक — आचार्य रामचंद्र शुक्ल मनुष्य अपने भावों, विचारों और व्यापारों के लिए दिए दूसरों के भावों, विचारों और व्यापारों के साथ कहीं मिलता और कहीं लड़ाता हुआ अंत तक चला चलता है और इसी को जीना कहता है। जिस अनंत-रूपात्मक क्षेत्र में यह व्यवसाय चलता रहता है उसका नाम है जगत्। जब तक…

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नर हो, न निराश करो मन को

✍️ मैथिलीशरण गुप्त नर हो, न निराश करो मन कोकुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करोयह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न होकुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन कोसँभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भलासमझो…

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