एक सहयात्री

“कई वर्ष बीत जाते हैं, पर कुछ यात्राएँ समय की धूल में नहीं दबतीं। वे स्मृति के किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहती हैं और जीवन के किसी अनपेक्षित क्षण में अचानक सामने आ खड़ी होती हैं। आज ऐसा ही एक क्षण आया—और उसके साथ लौट आई पटना से कटिहार तक की वह रेलयात्रा, जिसमें मिला एक ऐसा सहयात्री, जिसने अनजाने ही मेरे भीतर की कई धारणाओं को बदल दिया।
वह एक साधारण-सी यात्रा थी। इंटरसिटी ट्रेन, तीन सहयात्री और लंबा सफर। मेरे साथ एक शिक्षक मित्र थे—स्पष्ट वक्ता, तीव्र दृष्टि और तुरंत निष्कर्ष निकाल लेने की प्रवृत्ति वाले। खिड़की के पास वे बैठे थे, बीच में मैं, और किनारे वह सज्जन, जिनका स्मरण आज भी उतना ही सजीव है।
लंबा कद, न अधिक मोटे न दुबले, सफेद खादी का कुर्ता, उसके ऊपर क्रीम रंग की बंडी, माथे पर हल्का-सा तिलक और कंधे पर खादी का थैला—उनका बाह्य व्यक्तित्व किसी जानी-पहचानी सामाजिक छवि का निर्माण कर रहा था। गाड़ी खुली, कुछ देर बाद उन्होंने थैले से एक पत्रिका निकाली और पढ़ने लगे। हम भी अपनी बातों में मशगूल हो गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने पहली पत्रिका रखकर दूसरी निकाल ली। उसी क्षण मेरे शिक्षक मित्र ने मेरे कान के पास झुककर कुछ ऐसा कहा, जो एक त्वरित निर्णय का उदाहरण था।
मैं कुछ नहीं बोला। शायद इसलिए कि वे सज्जन मेरे ठीक बगल में थे, और शायद इसलिए भी कि मैं किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की जल्दी में नहीं था।पर मनुष्य का स्वभाव है—वह दूसरों के विषय में बात किए बिना रह नहीं सकता। धीरे-धीरे हमारी बातचीत उन्हीं सज्जन पर केंद्रित हो गई। मेरे मित्र कभी उन्हें नेता का चमचा बताते, कभी लॉटरी टिकट बेचने वाला, तो कभी कोई और विशेषण जोड़ देते। वे हँसते, और उनके साथ-साथ मेरी चुप्पी भी हँसी का विषय बनती।
मुझसे पूछा गया—
“तुम्हें क्या लगता है, ये आदमी कौन हो सकता है?”
मैंने जल्दबाजी नहीं की। मेरे भीतर कोई आवाज कह रही थी—
“अभी सफर बाकी है।”
चाय वाला आया। सज्जन ने चाय ली और मेरी ओर ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों। मैंने इशारे से मना कर दिया। कुछ क्षण बाद उन्होंने थैले से पान मसाले की छोटी डिब्बी निकाली, हथेली पर कुछ दाने रखे और मुँह में डाल लिए।
फिर उनकी दृष्टि कभी खिड़की के बाहर दौड़ते दृश्यों पर जाती, कभी आसपास के यात्रियों पर, और कभी हम दोनों पर। ऐसा लगता था मानो वे केवल यात्रा नहीं कर रहे हों, बल्कि जीवन को पढ़ रहे हों—शांत, सूक्ष्म और गहन दृष्टि से।
मैंने उनके थैले में रखी पत्रिकाओं पर ध्यान दिया—विज्ञान प्रगति, सरस सलिल, इंडिया टुडे, आउटलुक, ओशो टाइम्स और एस्ट्रोलॉजिकल जर्नल। विषयों की यह विविधता मुझे चकित कर रही थी। यह व्यक्ति किसी एक खांचे में फिट नहीं बैठ रहा था।
तभी मित्र ने फिर टोका—“अब बताओ, तुम्हें क्या लगता है?”
मैंने कहा—
“नेता भी हो सकता है, लेखक भी, या कोई ज्योतिषी।”
मेरे इस उत्तर पर मित्र ने ठहाका लगाया। मेरी ‘कच्ची समझ’ पर कुछ और उपाधियाँ जोड़ दी गईं। तभी मैंने देखा—सज्जन हमारी ओर देख रहे थे। संभव है उन्होंने सब सुन लिया हो, पर वे कुछ बोले नहीं।
यही चुप्पी उनके व्यक्तित्व का सबसे गहरा पक्ष बन गई।
लगभग तीन-चार घंटे बीत चुके थे। तभी वे मेरी ओर मुड़े। चेहरे पर सौम्य मुस्कान थी। उन्होंने अपना परिचय दिया—वे ज्योतिषी थे। किसी प्रसिद्ध ज्योतिष का नाम लेते हुए बताया कि पंद्रह वर्षों तक उन्होंने उनके साथ रहकर शिष्य के रूप में सेवा की है, और अब देश के कई बड़े शहरों में उनके परामर्श के लिए समय निर्धारित रहता है।
उन्होंने कहा—
“मैं राह चलते किसी के हाथ नहीं देखता, पर तुम्हारे और तुम्हारे मित्र के माथे मैंने पढ़ लिए।”
फिर उन्होंने मेरे शिक्षक मित्र की कुंडली जैसे खोल दी—भूत, वर्तमान और भविष्य। मित्र स्तब्ध थे। मैं भीतर से थोड़ा सहम गया। सामने अब कोई साधारण सहयात्री नहीं, बल्कि अनुभव से गढ़ा हुआ एक प्रभावशाली व्यक्तित्व था।
अंत में उन्होंने मेरे सिर को हल्के से उठाया, आँखों में देखा और कहा—
“तुम्हारा सफर अभी शुरू हुआ है। मंज़िल अभी बाकी है। धैर्य और ईमानदारी से आगे बढ़ते रहो।”
उन शब्दों में भविष्यवाणी कम, भरोसा अधिक था। यह कोई चमत्कार नहीं था—यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ देने वाली भाषा थी। कुछ अच्छे ख्वाब, थोड़ा आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा—बस इतना ही।
कुछ देर बाद गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। उन्होंने कहा—
“यहाँ मेरी पुत्री रहती है।”
और मुस्कुराते हुए उतर गए।
हमारा सफर जारी था, पर भीतर का वातावरण बदल चुका था। मैं और मेरे शिक्षक मित्र—दोनों कुछ देर तक मौन रहे। शायद इसलिए नहीं कि किसी ने भविष्य बता दिया था, बल्कि इसलिए कि हमारे भीतर के कई अनुमान, कई पूर्वाग्रह, बिना कोई शोर किए टूट चुके थे।
उस यात्रा ने मुझे यह सिखाया कि हम अक्सर मनुष्य को उसके आवरण से आँक लेते हैं—कपड़ों से, आदतों से, रुचियों से। हम निर्णय जल्दी कर लेते हैं, क्योंकि ठहरकर देखने का धैर्य हमारे पास नहीं होता। जबकि हर व्यक्ति अपने भीतर एक पूरी दुनिया समेटे होता है—अदृश्य, जटिल और बहुरंगी।
अच्छे और बुरे लोग कहीं दूर नहीं होते। वे यहीं होते हैं—हमारे आसपास, हमारे साथ, हमारे ही सफर में। प्रश्न यह नहीं कि कौन अच्छा है और कौन बुरा; प्रश्न यह है कि हम देखने का साहस कितना रखते हैं।
उस सहयात्री ने मुझे यह नहीं सिखाया कि हर व्यक्ति अच्छा होता है। उसने बस इतना सिखाया कि हर व्यक्ति को समझने से पहले उसे सुनना चाहिए। जीवन की अधिकांश किताबें अपने पहले पन्ने में सच नहीं लिखतीं।
अब जब भी किसी नए व्यक्ति से मिलता हूँ, तो पहले उसके शब्द सुनता हूँ—क्योंकि कई बार सच, आवरण के बहुत पीछे छिपा होता है।

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