साँझ के समय शहर की सड़क पर परछाइयों के बीच बहती ज़िन्दगी का दृश्य

परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी

✒️ कुन्दन समदर्शी परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,साँझ की उन -पगडंडियों सीजहाँ धूप थककर पेड़ों के तलेचुपचाप बैठ जाती है। हर कदम पर स्मृतियों कीकोमल पत्तियाँ चटकती हैं—कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,जैसे समय ने उन्हेंपूरा विदा करना भूल गया हो। हम तेज़ चले,कि कहीं यह न दिखेकि भीतर एक नन्हा-सा मनअब भी किसी पुराने…

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नव वर्ष और बसंत की आहट का प्रतीकात्मक चित्र

नव वर्ष : बसंत की आहट

आओ,नए वर्ष कोहथेली पर रखी धूप की तरहसहेज लें—जिसमें बीते कल की ठंडक भी होऔर आने वाले स्वप्नों की ऊष्मा भी।कुछ पत्तेझरे हैं स्मृतियों के;कुछ शाखाएँ अभी भीप्रतीक्षा में काँप रही हैं।पर देखो—कहीं भीतरकिसी कोपल नेफिर से हिम्मत की हैजन्म लेने की।नव वर्षकोई तिथि नहीं;यह तोजीवन की देह मेंफिर सेविश्वास कारक्त-संचार है।हवा मेंबसंत की पहली…

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jindagi ke do chehre image

चेहरे जिंदगी के

चेहरे जिंदगी के – यह हिंदी कविता जीवन की दोहरी भावनाओं, हँसी और खामोशी, उजाले और अंधेरे के बीच झूलते अनुभवों को शब्द देती है। पढ़िए MyHindagi.com पर।

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इंतिहान लिख दूँ

जिंदगी के इम्तिहान

एक सुनहरी सुबह की कोई शाम लिख दूँ,ठोकर खाकर जो गिरा, वो अंजाम लिख दूँ।जज़्बातों के भँवर में ऐसे उलझा हूँ, यारो,चलो ज़िंदगी के सारे इम्तिहान लिख दूँ। जो सीखा है हमने अपनी तन्हाइयों में,उस हर सफ़े पर अपना पैग़ाम लिख दूँ।कभी सन्नाटों ने दिया हौसला मुझको,कभी आंधियों में खुद ही सँभाला खुद को। अब…

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जिंदगी का संघर्ष

ज़िंदगी की सलवटें

✍️-कुन्दन समदर्शीसमकुन्दन समदर्शीदर्शीन् समदर्शी संघर्षों की धूप देखी है,ऐ ज़िंदगी…कितने ज़ख़्मों के निशां अब भी हैं उर-अंतर में। ये ज़ख़्म…जो अबचीखते नहीं,बस चुपचापसीने की तहों मेंकुछ गहरी सलवटों-से पड़े हैं,जिन्हें समय की उँगलियों नेसिर्फ़ स्पर्श किया—कोई गाँठ न खुली। माथे की लकीरेंअब इबारत नहीं रचतीं,वे अबअनकहे स्वप्नों के अस्फुट मानचित्र हैं—जिन्हें वक़्त ने देखा भी,पर…

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Maun samvedana image

🕯️ संवेदना का मौन

✍️ कुन्दन समदर्शी कुचल दिए कुछ प्रश्न थे,जो चीखते थे मौन में।कुछ उत्तर थे भीड़ के,जो दब गए समय के शोर में। वेदना लिपटी है मुस्कानों में,जैसे राख में बुझी चिंगारी।कोई देखे तो कह दे — अभिनय है,कोई सुने तो कहे — लाचारी। संवेदना का बाज़ार है,दया यहाँ दामों में बिकती है,आँसू भी अब डिब्बों…

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मौन की मशाल का चित्रा

✨ मौन की मशाल

भूमिका:हर युग की क्रांति में शोर नहीं होता — कभी एक मौन ही होता है जो समय को जगा देता है। यह कविता उन खामोश आंदोलनों, लेखनी की ताकत, और आंतरिक ज्वालाओं को समर्पित है, जो बिना नारे, बिना बगावत के प्रतीक बन जाती हैं। हर काम शोर मचाकर नहीं होता,कुछ काम ख़ामोशी कर जाती…

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