मोहनदास से महात्मा तक : गांधी के जीवन और विचारों की यात्रा

महात्मा गांधी का चित्र

इतिहास में कभी-कभी कोई साधारण-सा दिखने वाला मनुष्य अपने असाधारण विचारों से अपने समय की सीमाएँ लाँघ जाता है। उसके हाथ में न तलवार होती है, न कोई विशाल सेना; फिर भी उसकी आवाज सत्ता की ऊँची दीवारों तक पहुँचती है और उसका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रश्न बन जाता है—क्या सत्य और अहिंसा जैसी सरल दिखाई देने वाली शक्तियाँ भी इतिहास की दिशा बदल सकती हैं? मोहनदास करमचंद गांधी का जीवन इसी प्रश्न का एक जीवंत उत्तर है।

2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर की धरती पर जन्मा वह संकोची बालक आगे चलकर ‘महात्मा गांधी’ के नाम से दुनिया में जाना गया। मोहनदास से महात्मा तक की यह यात्रा किसी उपाधि की यात्रा नहीं थी; यह आत्मसंघर्ष, प्रयोग, त्याग और सत्य की निरंतर खोज से गुजरने वाली एक लंबी यात्रा थी। उन्होंने अपने जीवन से यह दिखाने का प्रयास किया कि किसी मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके बाहुबल में नहीं, बल्कि उसके चरित्र, आत्मबल और सत्य के प्रति उसकी प्रतिबद्धता में निहित हो सकती है।

मेरी दृष्टि में गांधी महान इसलिए नहीं थे कि इतिहास ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा, बल्कि इसलिए कि उन्होंने सत्य और अहिंसा को केवल विचार के रूप में स्वीकार नहीं किया; उन्हें अपने जीवन की कसौटी बनाया। उन्होंने अन्याय का विरोध किया, लेकिन मनुष्य से घृणा को अपना हथियार नहीं बनाया। उन्होंने स्वतंत्रता की माँग की, लेकिन उसे केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए स्वतंत्रता मनुष्य की गरिमा, आत्मसम्मान, सामाजिक समानता और नैतिक जीवन से जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि गांधी को समझना केवल एक स्वतंत्रता सेनानी की जीवनी पढ़ना नहीं है; गांधी को समझना उस मनुष्य की यात्रा को समझना है, जिसने स्वयं को लगातार परखा, अपने विचारों के साथ प्रयोग किए और अपने जीवन को ही अपनी सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना दिया।

करमचंद गांधी और पुतलीबाई के घर जन्मे मोहनदास का बचपन सामान्य था। उन्होंने पोरबंदर और राजकोट में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1888 में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए और 1891 में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। एक युवा बैरिस्टर के रूप में उनके जीवन की दिशा अभी निश्चित नहीं हुई थी। लेकिन 1893 में दक्षिण अफ्रीका की यात्रा ने उनके जीवन को एक निर्णायक मोड़ दिया। वहाँ भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव और अन्याय का उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया। व्यक्तिगत अपमान धीरे-धीरे उनके लिए एक व्यापक सामाजिक और नैतिक प्रश्न बन गया। जिस अन्याय को वे स्वयं महसूस कर रहे थे, उसके विरुद्ध आवाज उठाने की आवश्यकता उन्हें भीतर से बेचैन करने लगी। यहीं से मोहनदास के भीतर उस गांधी का निर्माण आरंभ हुआ, जिसे आगे चलकर दुनिया ने सत्याग्रही के रूप में पहचाना।

दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने अन्याय के विरुद्ध जिस अहिंसक प्रतिरोध को विकसित किया, वह आगे चलकर ‘सत्याग्रह’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गांधी के लिए सत्याग्रह केवल किसी सरकार या सत्ता के विरुद्ध आंदोलन करने की तकनीक नहीं था। यह सत्य के प्रति आग्रह था, अन्याय के सामने झुकने से इनकार था और आत्मबल के माध्यम से परिवर्तन की कोशिश थी। उनका विश्वास था कि अन्याय करने वाले व्यक्ति से घृणा किए बिना भी उसके अन्याय का विरोध किया जा सकता है। यह विचार उस समय की प्रचलित राजनीतिक सोच से बिल्कुल अलग था। सामान्यतः यह माना जाता था कि शक्तिशाली सत्ता का मुकाबला उससे अधिक शक्तिशाली साधनों से ही किया जा सकता है, लेकिन गांधी ने इस धारणा को चुनौती दी। उन्होंने मनुष्य की नैतिक शक्ति को उसकी शारीरिक शक्ति से ऊपर रखने का प्रयास किया।

दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षों ने गांधी को केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं बनाया, बल्कि उन्हें अपने विचारों का प्रयोग करने का अवसर दिया। उन्होंने देखा कि जब सामान्य मनुष्य अपने भीतर के भय को पराजित कर देता है, तब वह अन्यायपूर्ण व्यवस्था के सामने भी खड़ा हो सकता है। यहीं गांधी के जीवन में सत्य और अहिंसा केवल शब्द नहीं रहे, बल्कि जीवन के सिद्धांत बनते गए।

1915 में जब गांधी भारत लौटे तो वे केवल एक बैरिस्टर बनकर नहीं लौटे थे। वे अपने साथ संघर्ष का एक नया दर्शन लेकर आए थे। भारत लौटने के बाद उन्होंने देश को समझने का प्रयास किया। उन्होंने किसानों, मजदूरों और सामान्य लोगों के जीवन को निकट से देखा। उन्होंने महसूस किया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसके बड़े शहरों या अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त अभिजात वर्ग में नहीं, बल्कि उसके गाँवों और उन करोड़ों लोगों में है, जिनकी आवाज अक्सर सत्ता तक नहीं पहुँचती।

1917 का चंपारण सत्याग्रह इसी दृष्टि का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना। बिहार की धरती पर किसानों की समस्याओं को समझने और उनके पक्ष में खड़े होने के लिए गांधी का पहुँचना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी। उन्होंने संघर्ष को शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक जागरूकता से भी जोड़ा। इससे स्पष्ट हुआ कि गांधी के लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था। वे ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे जिसमें सामान्य मनुष्य के जीवन में भी सम्मान, आत्मविश्वास और अधिकार का अनुभव हो।

धीरे-धीरे गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता की आकांक्षा को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ा। गांधी की विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष को केवल नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आंदोलन बनाकर नहीं छोड़ा। किसान, मजदूर, महिलाएँ, विद्यार्थी और समाज के विभिन्न वर्ग इसमें जुड़ते गए। स्वतंत्रता की लड़ाई एक राजनीतिक आंदोलन से आगे बढ़कर जन-आंदोलन का रूप लेने लगी।

1930 का नमक सत्याग्रह इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि गांधी सामान्य-सी वस्तु को भी असाधारण राजनीतिक प्रतीक में बदल सकते थे। नमक हर व्यक्ति की आवश्यकता था। उसके माध्यम से गांधी ने यह प्रश्न खड़ा किया कि जिस वस्तु पर प्रकृति का समान अधिकार है, उस पर अन्यायपूर्ण सत्ता का एकाधिकार क्यों स्वीकार किया जाए। साबरमती से दांडी तक की उनकी यात्रा केवल पैदल चलने की यात्रा नहीं थी; वह भारतीय जनमानस में आत्मविश्वास जगाने वाली यात्रा थी। एक वृद्ध, निहत्था सत्याग्रही हाथ में लाठी लिए हजारों लोगों के बीच चलता हुआ उस साम्राज्य को चुनौती दे रहा था, जिसके पास विशाल सेना, प्रशासन और संसाधन थे। गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं था, लेकिन उनके पास सत्य, जनविश्वास और कष्ट सहने का साहस था।

गांधी के लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं थी। वे आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। इसी कारण उनके जीवन में स्वदेशी और खादी का विशेष स्थान रहा। उन्होंने विदेशी वस्त्रों का त्याग किया और चरखे को आत्मनिर्भरता, श्रम और स्वाभिमान का प्रतीक बनाया। उनके लिए चरखा केवल सूत कातने का साधन नहीं था; वह उस भारत का प्रतीक था, जो अपने श्रम और संसाधनों के बल पर खड़ा होना चाहता था। गांधी स्वयं भी अपने जीवन में सादगी को अपनाते गए। उनका पहनावा जितना सरल होता गया, उनके व्यक्तित्व का नैतिक प्रभाव उतना ही गहरा होता गया। वे जिस भारत के सबसे गरीब व्यक्ति की बात करते थे, स्वयं को उसके जीवन से दूर नहीं रखना चाहते थे।

शायद गांधी की महानता का एक कारण यह भी था कि उन्होंने अपने और अपने विचारों के बीच दूरी नहीं रहने दी। वे दूसरों से सादगी की अपेक्षा करते थे तो स्वयं भी सादगी का जीवन जीते थे। वे स्वदेशी की बात करते थे तो स्वयं खादी पहनते थे। वे आत्मसंयम की बात करते थे तो अपने जीवन में उसे साधने का प्रयास करते थे। वे सत्य की बात करते थे तो अपनी कमजोरियों और प्रयोगों को भी छिपाने के बजाय सार्वजनिक रूप से स्वीकार करते थे। उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ इसी आत्मपरीक्षण की एक असाधारण मिसाल है।

गांधी केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। वे समाज को भीतर से बदलना भी चाहते थे। जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध उन्होंने लगातार आवाज उठाई। वे चाहते थे कि किसी मनुष्य के साथ केवल उसकी जाति के कारण भेदभाव न हो। उन्होंने सामाजिक सुधार को स्वतंत्रता आंदोलन से अलग नहीं माना। उनके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी थी, जब तक समाज के भीतर मनुष्य-मनुष्य के बीच अपमान और भेदभाव मौजूद रहे।

हालाँकि जाति और सामाजिक न्याय के प्रश्न पर गांधी के विचारों की आलोचना भी हुई और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महान विचारकों के साथ उनके गंभीर मतभेद रहे। गांधी और आंबेडकर की दृष्टियों को एक-दूसरे का पर्याय मानना इतिहास को सरल बना देना होगा। दोनों ने सामाजिक अन्याय का प्रश्न उठाया, लेकिन उनके रास्ते, प्राथमिकताएँ और समाधान कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अलग थे। मेरे विचार से गांधी की महानता का अर्थ उन्हें आलोचना से ऊपर रख देना नहीं है। किसी महान व्यक्ति के विचारों को सम्मानपूर्वक समझना और जहाँ आवश्यक हो, उनसे प्रश्न करना—दोनों साथ संभव हैं।

गांधी धार्मिक आस्था रखने वाले व्यक्ति थे, लेकिन उनकी दृष्टि में धर्म मनुष्यों को बाँटने का माध्यम नहीं था। वे विभिन्न धर्मों के बीच सद्भाव और संवाद में विश्वास रखते थे। उनका भारत ऐसा भारत था जिसमें हिंदू और मुसलमान, सिख और ईसाई, सभी समान सम्मान के साथ रह सकें। शायद यही कारण है कि स्वतंत्रता के अंतिम वर्षों में, जब देश सांप्रदायिक हिंसा से गुजर रहा था, तब गांधी सत्ता के उत्सव से दूर उन लोगों के बीच दिखाई दिए, जिन्हें हिंसा ने सबसे अधिक पीड़ा दी थी।

भारत का विभाजन गांधी के लिए अत्यंत पीड़ादायक था। वे धार्मिक आधार पर देश के विभाजन के विरोधी रहे और हिंदू-मुस्लिम एकता को अपने सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण आदर्श मानते रहे। 1946 और 1947 के सांप्रदायिक तनाव के दौरान उनका प्रयास राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से अधिक लोगों के बीच शांति स्थापित करने का था। वे नोआखली गए, कलकत्ता में रहे और दिल्ली में भी सांप्रदायिक सद्भाव के लिए उपवास किया। जिस समय देश स्वतंत्रता के उत्सव में डूब रहा था, उस समय गांधी उन लोगों के बीच थे, जिनके घरों में स्वतंत्रता का उत्सव हिंसा और विभाजन की पीड़ा से ढक गया था। यह दृश्य गांधी के व्यक्तित्व को समझने के लिए शायद किसी भी भाषण से अधिक प्रभावशाली है।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन गांधी दिल्ली में सत्ता के केंद्र में नहीं थे। वे हिंसा से पीड़ित लोगों के बीच थे। जिस व्यक्ति ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने में अपना जीवन लगा दिया था, वह स्वतंत्रता के दिन भी अपने लिए कोई पद या सत्ता नहीं चाहता था। शायद यही कारण है कि गांधी को केवल राजनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा।

वे लेखक भी थे, पत्रकार भी थे और विचारक भी। ‘हिन्द स्वराज’ से लेकर ‘सत्य के प्रयोग’ तक उनके लेखन में आधुनिक सभ्यता, राजनीति, अर्थव्यवस्था, नैतिकता, स्वराज और मनुष्य के जीवन को लेकर अनेक प्रश्न दिखाई देते हैं। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अपने विचारों को जनता तक पहुँचाया और सार्वजनिक संवाद को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। उनके लिए लेखनी भी सत्य की खोज का माध्यम थी।

मेरी नजर में गांधी की महानता का सबसे बड़ा कारण यही है कि उन्होंने अपने जीवन को अपने विचारों की कसौटी बनाया। उन्होंने यह दावा नहीं किया कि वे पूर्ण हैं। उन्होंने अपने जीवन को प्रयोग कहा। वे बदलते रहे, सीखते रहे और स्वयं को परखते रहे। यही उन्हें केवल किसी ऊँचे मंच पर खड़े नेता से अलग करता है। गांधी को देखकर ऐसा लगता है जैसे एक मनुष्य अपने भीतर की कमजोरियों से संघर्ष करते हुए धीरे-धीरे उस ऊँचाई की ओर बढ़ रहा हो, जहाँ व्यक्ति से अधिक उसका विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।

उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि अन्याय का विरोध करने के लिए हिंसा अनिवार्य नहीं है और बाहुबल से कहीं अधिक प्रभावी मनुष्य का आत्मबल भी हो सकता है।उनकी महानता इस बात में भी थी कि उन्होंने स्वतंत्रता को केवल सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं देखा। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ था—मनुष्य का भय से मुक्त होना, समाज का भेदभाव से मुक्त होना, गाँवों का आत्मनिर्भर होना, श्रम का सम्मान होना और मनुष्य का मनुष्य के प्रति करुणा रखना। वे जिस स्वराज की बात करते थे, उसमें केवल अंग्रेजों की सत्ता समाप्त होना पर्याप्त नहीं था; व्यक्ति और समाज को अपने भीतर भी स्वतंत्र और जिम्मेदार बनना था।

30 जनवरी 1948 को गांधी की जीवन-यात्रा समाप्त हो गई। लेकिन क्या गांधी वहीं समाप्त हो गए? शायद नहीं। कुछ व्यक्तित्व शरीर से विदा होकर भी विचारों में जीवित रहते हैं। गांधी भी उन्हीं में से एक हैं। आज हम उनके विचारों से सहमत हों या असहमत, उनके तरीके को स्वीकार करें या उनकी आलोचना करें, लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, सामाजिक समानता, धार्मिक सद्भाव और नैतिक राजनीति जैसे प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं।

मेरी दृष्टि में गांधी की सबसे बड़ी विरासत कोई स्मारक, कोई प्रतिमा या कोई उपाधि नहीं है। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह प्रश्न है, जो वे हमारे सामने छोड़ गए—क्या हम जिस परिवर्तन की अपेक्षा समाज से करते हैं, उसकी शुरुआत स्वयं से करने को तैयार हैं?

मोहनदास से महात्मा तक की यात्रा इसी प्रश्न की यात्रा है। यह यात्रा बताती है कि महात्मा कोई जन्मजात उपाधि नहीं होती। वह जीवन के संघर्षों, आत्मअनुशासन, सत्य के प्रति प्रतिबद्धता और मानवता के प्रति करुणा से अर्जित होती है।

पोरबंदर का वह बालक, जो कभी सामान्य संकोच और अपनी कमजोरियों से जूझता था, धीरे-धीरे ऐसा मनुष्य बना, जिसने अपने समय की सबसे शक्तिशाली सत्ता के सामने अहिंसा के साथ खड़े होने का साहस किया। उसने दुनिया को यह दिखाने का प्रयास किया कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति केवल उसके शरीर, हथियार या सत्ता में नहीं, बल्कि उसके चरित्र में भी होती है।

शायद इसलिए गांधी मेरे लिए महान हैं।

इसलिए नहीं कि वे कभी गलत नहीं हो सकते थे, इसलिए नहीं कि उनके प्रत्येक विचार से सहमत होना आवश्यक है, और न ही केवल इसलिए कि इतिहास ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा।

वे मेरे लिए इसलिए महान हैं क्योंकि उन्होंने सत्य को केवल कहा नहीं, उसे जीने का प्रयास किया; अहिंसा को केवल समझाया नहीं, उसे संघर्ष का साधन बनाया; सादगी को केवल उपदेश नहीं दिया, उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाया और स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और आत्मसम्मान से जोड़कर देखा।

हाड़-मांस का वह साधारण मनुष्य शायद इसलिए असाधारण बन गया, क्योंकि उसने अपने भीतर के मनुष्य को लगातार खोजने का प्रयास किया।

और शायद यही मोहनदास से महात्मा तक की सबसे बड़ी यात्रा है—

एक मनुष्य का स्वयं से संघर्ष करते हुए मानवता के लिए प्रकाश बन जाने की यात्रा।

– कुन्दन समदर्शी

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