भारत की पावन धरती पर,
जिसने स्वर का रूप लिया,
जन-जन के मन की बात कही,
हिंदी ने विस्तार लिया।
कबीर ने इसमें सत्य कहा,
मीरा ने प्रेम सुनाया है,
तुलसी ने मर्यादा रचकर,
जन-जन को राह दिखाया है।
जैसी मन में उठती वाणी,
वैसी ही यह लिखती है,
सच्चे, सरल और सहज भाव से,
मन की बातें कहती है।
दुःख में बनती सांत्वना,
सुख में बनता गीत है,
जन-जन के जीवन से जुड़ी,
हिंदी मन की प्रीत है।
पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण,
सबको गले लगाती है,
भाषा, बोली, भेद भुलाकर,
सबमें प्रेम जगाती है।
अनेकता में एकता का,
पावन मंत्र सिखाती है,
टूटे मन को जोड़-जोड़कर,
अपनापन बरसाती है।
माँ की ममता, माटी की खुशबू,
इसमें सदा समाई है,
भारत के जन-जन के मन में,
इसकी छवि बस पाई है।
गाँवों की चौपालों से लेकर,
नगरों के गलियारों तक,
हिंदी गूँजे प्रेम बनकर,
भारत के हर द्वारों तक।
कभी लोरी बनकर बहती,
कभी वीरों का गान है,
कभी प्रेम की मधुर सरगम,
कभी राष्ट्र का मान है।
यह केवल भाषा नहीं हमारी,
भारत की पहचान है,
जन-जन के मन में बसने वाली,
हिंदी का गौरवगान है।
भारत माँ के भाल सजी यह,
शब्दों की मुस्कान है,
हिंदी केवल भाषा ही नहीं,
हम सबकी पहचान है।