निराला का काव्य और कथा साहित्य: एक समग्र अध्ययन
हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद का युग स्वर्णिम अध्याय के रूप में प्रतिष्ठित है और उसके चार प्रमुख स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वे केवल महाप्राण कवि ही नहीं, बल्कि समर्थ कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार भी थे। हिंदी कविता को परंपरागत बंधनों से मुक्त कर मुक्तछंद को…
एक सहयात्री
“कई वर्ष बीत जाते हैं, पर कुछ यात्राएँ समय की धूल में नहीं दबतीं। वे स्मृति के किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहती हैं और जीवन के किसी अनपेक्षित क्षण में अचानक सामने आ खड़ी होती हैं। आज ऐसा ही एक क्षण आया—और उसके साथ लौट आई पटना से कटिहार तक की वह रेलयात्रा, जिसमें…
परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी
✒️ कुन्दन समदर्शी परछाइयों के बीच भागती ज़िन्दगी,साँझ की उन -पगडंडियों सीजहाँ धूप थककर पेड़ों के तलेचुपचाप बैठ जाती है। हर कदम पर स्मृतियों कीकोमल पत्तियाँ चटकती हैं—कुछ पीली, कुछ अभी भी हरी,जैसे समय ने उन्हेंपूरा विदा करना भूल गया हो। हम तेज़ चले,कि कहीं यह न दिखेकि भीतर एक नन्हा-सा मनअब भी किसी पुराने…
जीवन : एक अनवरत यात्रा
जीवन किसी स्थिर चित्र या जड़ संरचना का नाम नहीं है। वह तो एक निरंतर बहती हुई धारा है—जिसमें ठहराव नहीं, केवल प्रवाह है। इस प्रवाह में कभी संघर्षों की तीखी धूप हमें झुलसाती है, तो कभी सुकून की शीतल छाँव हमारी थकान को सहला जाती है। हर अनुभव, हर पड़ाव, हर ठोकर और हर…
जयशंकर प्रसाद : छायावाद का विराट स्तम्भ
हिंदी साहित्य के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व केवल रचनाकार नहीं होते, वे युग-चेतना के निर्माता होते हैं। छायावादी युग में यदि किसी एक साहित्यकार ने कविता, नाटक और कथा—तीनों विधाओं में समान रूप से गहन, स्थायी और निर्णायक छाप छोड़ी है, तो वह हैं जयशंकर प्रसाद। उनका साहित्य किसी एक भाव, किसी एक प्रवृत्ति या…
कछुआ और हंस
(नीति-कथा : वाणी पर संयम) एक तालाब में एक कछुआ रहता था। उसी तालाब में दो हंस प्रायः तैरने आया करते थे। हंस अत्यंत हंसमुख, मिलनसार और ज्ञानी थे। दूर-दूर तक घूमने के कारण वे अनेक स्थानों की अद्भुत बातें जानते थे। कछुए और हंसों की मित्रता शीघ्र ही गहरी हो गई। कछुए को हंसों…
नव वर्ष : बसंत की आहट
आओ,नए वर्ष कोहथेली पर रखी धूप की तरहसहेज लें—जिसमें बीते कल की ठंडक भी होऔर आने वाले स्वप्नों की ऊष्मा भी।कुछ पत्तेझरे हैं स्मृतियों के;कुछ शाखाएँ अभी भीप्रतीक्षा में काँप रही हैं।पर देखो—कहीं भीतरकिसी कोपल नेफिर से हिम्मत की हैजन्म लेने की।नव वर्षकोई तिथि नहीं;यह तोजीवन की देह मेंफिर सेविश्वास कारक्त-संचार है।हवा मेंबसंत की पहली…
मैथिलीशरण गुप्त : शब्दों में बसती सभ्यता
यदि किसी कवि को पढ़ते हुए ऐसी अनुभूति हो कि आप केवल शब्द नहीं पढ़ रहे, बल्कि शब्दों में निहित भावों के माध्यम से पूरी सभ्यता आपसे संवाद कर रही है — तो समझिए आप मैथिलीशरण गुप्त के संसार में प्रवेश कर चुके हैं।उनके यहाँ कविता भाषा नहीं रह जाती, संस्कार बन जाती है; पंक्तियाँ…
रामवृक्ष बेनीपुरी : कलम का जादूगर
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन केवल बंदूक और बारूद का इतिहास नहीं है; वह विचारों, शब्दों और चेतना का भी महायज्ञ रहा है। इस यज्ञ में जिन साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से विचारों के महायज्ञ में आहुति दिए, उनमें रामवृक्ष बेनीपुरी का नाम अत्यंत आदर और गंभीरता से लिया जाता है। कलम के जादूगर के रूप में…
गोनू झा की पहलवानी
मिथिला के राजदरबार में एक दिन हलचल मची हुई थी।दिल्ली का एक मशहूर पहलवान पूरे शहर में एलान करता घूम रहा था—“क्या मिथिला में कोई ऐसा बलवान नहीं, जो मेरे साथ अखाड़े में उतर सके?” उसकी छह फुट लंबी देह, साँवलापन, और उभरी हुई नसें ऐसी लगती थीं जैसे शरीर में लहरें दौड़ रही हों।…